गोविंद मिश्र के कथा साहित्य में पारिवारिक संबंधों का बदलता स्वरूप और मूल्य-संकट

Authors

  • निकिता पाण्डेय शोधार्थी ,हिन्दी:विभाग ,भारती विश्वविद्यालय, दुर्ग (छत्तीसगढ़) Author

Keywords:

गोविंद मिश्र, कथा साहित्य, पारिवारिक संबंध, परिवार, मूल्य-संकट, आधुनिकता, मध्यवर्ग, पीढ़ी-अंतराल, स्त्री-पुरुष संबंध, जीवन-मूल्य।

Abstract

समकालीन हिन्दी कथा साहित्य में गोविंद मिश्र का विशिष्ट स्थान है। उनके कथा साहित्य में भारतीय समाज के बदलते स्वरूप, मध्यवर्गीय जीवन, मानवीय संबंधों, सामाजिक विसंगतियों तथा बदलते जीवन-मूल्यों का संवेदनशील चित्रण मिलता है। विशेष रूप से उनके कथा-संसार में परिवार व्यक्ति के भावनात्मक, सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन की एक महत्त्वपूर्ण संस्था के रूप में उपस्थित होता है। बदलती सामाजिक परिस्थितियों के प्रभाव से परिवार की संरचना, पारिवारिक भूमिकाओं तथा आपसी संबंधों में निरंतर परिवर्तन दिखाई देता है।

आधुनिकता, नगरीकरण, शिक्षा का प्रसार, रोजगार के नए अवसर, आर्थिक दबाव, व्यक्तिवादी चेतना तथा स्त्री की बदलती सामाजिक स्थिति ने पारंपरिक पारिवारिक संरचना को गहराई से प्रभावित किया है। संयुक्त परिवारों का विघटन, एकल परिवारों की बढ़ती प्रवृत्ति, पति-पत्नी के संबंधों में बदलती अपेक्षाएँ, माता-पिता और नई पीढ़ी के बीच बढ़ती वैचारिक दूरी तथा पारिवारिक दायित्वों के प्रति बदलता दृष्टिकोण समकालीन समाज की प्रमुख विशेषताएँ बन गए हैं। गोविंद मिश्र इन परिवर्तनों को अपने कथा साहित्य में अत्यंत स्वाभाविक और मानवीय रूप में प्रस्तुत करते हैं।

उनके कथा साहित्य में पारिवारिक संबंध केवल प्रेम, स्नेह और आत्मीयता तक सीमित नहीं हैं, बल्कि उनमें तनाव, अकेलापन, संवादहीनता, स्वार्थ, दायित्व-बोध, अधिकार-बोध तथा व्यक्तिगत स्वतंत्रता की आकांक्षा भी दिखाई देती है। एक ओर व्यक्ति परिवार की भावनात्मक सुरक्षा चाहता है, तो दूसरी ओर वह अपने स्वतंत्र अस्तित्व और व्यक्तिगत इच्छाओं को भी महत्त्व देना चाहता है। इसी द्वंद्व से पारिवारिक संबंधों में मूल्य-संकट की स्थिति उत्पन्न होती है।

प्रस्तुत शोध-पत्र में गोविंद मिश्र के कथा साहित्य में चित्रित पारिवारिक संबंधों के बदलते स्वरूप तथा उनसे उत्पन्न मूल्य-संकट का विश्लेषण किया गया है। अध्ययन में पति-पत्नी संबंध, माता-पिता एवं संतान के संबंध, पीढ़ीगत अंतर, संयुक्त एवं एकल परिवार, स्त्री की बदलती भूमिका, व्यक्तिवादी चेतना तथा पारंपरिक और आधुनिक जीवन-मूल्यों के द्वंद्व को प्रमुख आधार बनाया गया है। अध्ययन से यह स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है कि गोविंद मिश्र पारिवारिक परिवर्तनों को केवल विघटन के रूप में नहीं देखते, बल्कि उन्हें बदलते भारतीय समाज की जटिल मानवीय प्रक्रिया के रूप में प्रस्तुत करते हैं।

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Published

2026-02-04

How to Cite

निकिता पाण्डेय. (2026). गोविंद मिश्र के कथा साहित्य में पारिवारिक संबंधों का बदलता स्वरूप और मूल्य-संकट. International Journal of Arts, Commerce & Education, 1(1), 31-41. https://avjournals.com/index.php/files/article/view/63